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Cover अधिकांश एशियाई देशों में आधुनिक चीज़ का सेवन हालिया घटना है. यह अक्सर आयातित होता है और प्रतीकात्मक है. यही विरोधाभास एशिया की वास्तविक चीज़ संस्कृति को और भी विशिष्ट बनाता है (फोटो: NutriScan App/Pixabay)
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एशिया में चीज़ संस्कृति का अभाव नहीं है. जहाँ भी चीज़ का अस्तित्व था, वह केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि दैनिक जीवन और अस्तित्व का अभिन्न अंग था

अक्सर यह माना जाता है कि एशिया में “चीज़” (cheese) का कोई इतिहास नहीं है. यह एक गलत धारणा है. वास्तव में, एशिया में दुनिया की कुछ सबसे पुरानी डेरी संस्कृतियां मौजूद हैं. इनमें से कई तो यूरोपीय संस्कृतियों से भी पुरानी हैं. यहाँ दूध और चीज़ विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की ज़रूरत थे. असली अंतर पूर्व बनाम पश्चिम का नहीं, बल्कि खेती करने वाले और घुमंतू समाजों के बीच का है. जहाँ लोग जानवरों के साथ घूमते थे, वहाँ चीज़ संस्कृति भी उनके साथ चली.

इन देशों ने सिर्फ चीज़ का सेवन नहीं किया, बल्कि इसके इर्द-गिर्द अपनी दिनचर्या भी बनाई. यहाँ चीज़ को प्रतिष्ठा या ‘टेरroir’ (terroir) के लिए पुराना (एज) नहीं किया जाता. इसे ताज़ा, सुखाकर, उबालकर या शोरबे में पिघलाकर खाया जाता है. यह प्रचुरता का नहीं, बल्कि निरंतरता का प्रतीक है. यहाँ कुछ ऐसे एशियाई देश हैं जिनकी अपनी अनूठी चीज़ संस्कृति है.

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मंगोलिया

Above एक मंगोलियाई परिवार को पारंपरिक चीज़ बनाते हुए देखें

मंगोलिया में दुनिया की सबसे गहरी चीज़ संस्कृति देखने को मिलती है. यह घुमंतू पशुपालन और मवेशियों पर पूर्ण निर्भरता से जन्मी है. यहाँ घोड़ों, याक, भेड़, बकरियों और गायों के दूध का उपयोग होता है. इसे किण्वित (फर्मेंट) करके, जमाकर और सुखाकर कई रूपों में बदला जाता है. ‘ब्यास्लाग’ (Byaslag) एक ताज़ा चीज़ है जिसे रोज़ खाया जाता है. वहीं, सर्दियों के लिए सूखे हुए कर्ड जमा किए जाते हैं.

यहाँ चीज़ को अन्य डेरी उत्पादों से अलग नहीं माना जाता. यह दही, सूखे दूध की परत और ‘ऐराग’ जैसे किण्वित पेय के साथ ही मौजूद रहता है. आधुनिक मंगोलियाई शेफ अब इसे शहरी संदर्भ में पेश कर रहे हैं. वे इसे चखने वाले मेनू (tasting menus) का हिस्सा बना रहे हैं. यह संस्कृति कभी गायब नहीं हुई, इसे बस किसी बाहरी मुहर की ज़रूरत नहीं थी.

भारत

Tatler Asia
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Above पनीर का विकास वास्तव में धर्म से प्रेरित है, लेकिन इसका प्रभाव उससे कहीं आगे निकल गया है (फोटो: कंवरदीप कौर/Unsplash)
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भारत की चीज़ संस्कृति विशाल है, हालाँकि यह यूरोप जैसी नहीं दिखती. पनीर, छेना और क्षेत्रीय कर्ड उत्तर भारतीय, बंगाली और पंजाबी व्यंजनों का अभिन्न अंग हैं. यह शाकाहार और मवेशियों पर केंद्रित कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ा है. यहाँ चीज़ ताज़ा होता है और इसे तुरंत पकाया जाता है. ऐतिहासिक रूप से चीज़ को पुराना (एज) करना अनावश्यक और अव्यावहारिक था.

चीज़ बोर्ड (cheese boards) के बजाय, भारत ने इसे पकाने की अनूठी कला विकसित की. यहाँ चीज़ मसालों और ग्रेवी को सोख लेता है. आज हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की कारीगर डेरी (artisanal dairies) एज्ड चीज़ (aged cheese) के साथ प्रयोग कर रही हैं. लेकिन मूल भावना आज भी ताज़ा चीज़ ही है जो विलासिता नहीं, बल्कि दैनिक प्रोटीन का स्रोत है.

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नेपाल और भूटान

हिमालय में चीज़ का अस्तित्व इसलिए है क्योंकि यह वहाँ की ज़रूरत है. याक और गाय के दूध को नरम और सख्त चीज़ में बदला जाता है. यह लंबी सर्दियों और यात्राओं के लिए बनाया जाता है. ‘छुर्पी’ (Chhurpi), विशेष रूप से इसका पत्थर जैसा सख्त रूप, यहाँ की संस्कृति को दर्शाता है. यहाँ भोजन को ऊंचाई और कमी दोनों को झेलना पड़ता है.

विशेष रूप से भूटान में, चीज़ को राष्ट्रीय व्यंजनों में शामिल किया जाता है. ‘एमा दात्शी’ (ema datshi) इसका उदाहरण है, जहाँ डेरी को मिर्च के साथ पिघलाया जाता है. इन समाजों में चीज़ कभी भी वैकल्पिक नहीं था — और न ही यह सजावट की वस्तु था.

तुर्की

तुर्की दो सभ्यताओं के मिलन बिंदु पर है. यहाँ की चीज़ संस्कृति सदियों के आंदोलन, साम्राज्य और देहाती जीवन को दर्शाती है. ‘बेयाज़ पेयनिर’ (beyaz peynir - नमकीन और भुरभुरा) से लेकर ‘तुलम’ (tulum - खाल में पुराना किया गया) तक, तुर्की चीज़ दैनिक भोजन का हिस्सा है. इसे केवल विशेष अवसरों के लिए नहीं रखा जाता.

तुर्की की खासियत इसका पैमाना है: हर नाश्ते की मेज पर चीज़ होता है, चाहे वह कोई भी क्षेत्र या वर्ग हो. भले ही इसे अक्सर यूरोप के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन अनातोलिया की डेरी संस्कृति आधुनिक सीमाओं से पुरानी है. यह एशिया की देहाती परंपरा का ही हिस्सा है.

ईरान

ईरानी चीज़ संस्कृति सादगी और दैनिक अनुष्ठान के इर्द-गिर्द घूमती है. ताज़ा सफेद चीज़ को फ्लैटब्रेड, जड़ी-बूटियों और चाय के साथ खाया जाता है. यह अक्सर नाश्ते में परोसा जाता है. यहाँ चीज़ को पुराना करने की परंपरा है, लेकिन ताज़गी ही इसकी मुख्य पहचान है.

ऐतिहासिक रूप से, यहाँ चीज़ शहरी और ग्रामीण दोनों आबादी के लिए प्रोटीन का स्रोत था. यह वाइन के बजाय रोटी के साथ जुड़ा था. आधुनिक ईरानी शेफ अब प्रवासी समुदायों में इन चीज़ों को समकालीन संदर्भों में फिर से पेश कर रहे हैं. वे तकनीक से ज़्यादा दूध की गुणवत्ता पर ज़ोर देते हैं.

मध्य एशिया (कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान)

मध्य एशिया में, चीज़ को अन्य डेरी प्रथाओं से अलग नहीं किया जा सकता. ‘कुर्त’ (Kurt), एक सूखा दही-चीज़ का गोला, और ताज़ा कर्ड यहाँ आम हैं. ये किण्वित पेय और मक्खन के साथ मौजूद रहते हैं. इन व्यंजनों में चीज़ को अलग नहीं माना जाता — यह दूध के जीवन चक्र का बस एक चरण है. जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, इन देशों की चीज़ संस्कृति को प्रलेखित और संरक्षित किया जा रहा है. इसे रोज़मर्रा के भोजन के बजाय अब विरासत के रूप में देखा जा रहा है.

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